देश का वो इकलौता राज्य जहाँ आज तक कोई भी महिला विधायक नहीं बन सकी है

NewsCode | 4 March, 2018 7:22 PM

नगालैंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां अभी तक एक भी महिला विधायक चुनकर विधानसभा तक नहीं पहुंची है। 

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नई दिल्ली।  नगालैंड की सियासत फिर आधी आबादी की दखल से बची रह गई। राज्य के 54 साल के इतिहास में महिलाएं एक बार फिर इतिहास रचने से चूक गईं। इस बार सर्वाधिक पांच महिलाएं चुनावी अखाड़े में उतरी थीं, लेकिन एक भी जीत का स्वाद नहीं चख पाईं। आलम यह रहा कि अखोई सीट से उम्मीदवार अवान कोन्याक को छोड़कर बाकी चारों महिलाएं चौथे और पांचवें पायदान पर रहीं।

बड़ा सवाल यह कि राज्य में बीते 15 वर्षो से सत्ता सुख भोग रही नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) और महिला अधिकारों की पक्षधर कांग्रेस ने एक भी महिला उम्मीदवार को टिकट क्यों नहीं दिया? मात्र दो सीटें पाने के बावजूद सरकार बनाने का दावा कर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सिर्फ एक महिला उम्मीदवार को टिकट देकर खानापूर्ति कर लेना मुनासिब क्यों समझा?

राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेश पंत कहते हैं, “नगालैंड का राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य अलग है। नगा समाज में माना जाता है कि राजनीति महिलाओं के लिए नहीं है। राजनीति को लेकर महिलाएं खुद ज्यादा सजग नहीं हैं, लेकिन अब स्थिति काफी हद तक सुधरी है। महिलाएं भी राजनीति में आना चाहती हैं, लेकिन समाज का ताना-बाना ही ऐसा है कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों को राजनीति में अधिक तरजीह दी जाती है।”

नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने सिर्फ दो महिलाओं को टिकट दिए, वहीं भाजपा ने सिर्फ एक महिला को टिकट देकर खानापूर्ति कर ली। राखिला को टिकट देने की वजह भी उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि रही। तुएनसांग सदर-2 सीट से चुनाव लड़ने वाली राखिला को 2,749 वोट मिले और वह तीसरे स्थान पर रहीं। राखिला इससे पहले 2013 का चुनाव भी लड़ी थीं और मात्र 800 वोटों से हार गई थीं।

एनपीपी ने जिन दो महिलाओं को टिकट दिए थे, उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। दीमापुर-3 सीट से वेदीऊ क्रोनू को सिर्फ 483 वोट मिले, जबकि पार्टी के टिकट पर नोकसेन सीट से चुनाव लड़ीं डॉ.के मांगयांगपुला चांग को मात्र 725 वोट ही मिले।

नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (एनडीपीपी) के टिकट पर अबोई सीट से चुनाव हार चुकीं अवान कोन्याक को 5,131 वोटों मिले, जबकि चिझामी सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रेखा रोज दुक्रू 338 वोटों से पांचवें स्थान पर रहीं।

नगालैंड की राजनीति में महिलाओं की पैठ न होने के बारे में माकपा नेता बृंदा करात ने आईएएनएस से कहा, “यही कारण है कि हम संविधान में संशोधन कर महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। रीति-रिवाजों के नाम पर नगा महिलाओं को राजनीति से दूर रखा जाता है। यहां तक कि मुख्यधारा की पार्टियां भी यहां महिलाओं को टिकट देने से कतराती हैं। नगालैंड में महिला आरक्षण को लेकर लोग सजग नहीं हैं।”

इन महिला उम्मीदवारों को मिले वोटों से साफ है कि पुरुष उम्मीदवारों की तुलना में इन्हें गिने-चुने वोट ही मिले हैं। राज्य में कुल 11 लाख 93 हजार मतदाता हैं, जिनमें से महिला मतदाताओं की संख्या छह लाख 89 हजार 505 है। इसका मतलब है कि महिलाओं ने भी महिला उम्मीदवारों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

दिल्ली विश्वविद्यालय की पीएचडी छात्रा गुंजन यादव कहती हैं, “महिलाओं को भी चुनाव लड़ने के मौके मिलने चाहिए, उनकी भूमिका सिर्फ राजनीतिक झंडे उठाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।”

नगालैंड देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां अभी तक एक भी महिला विधायक चुनकर विधानसभा तक नहीं पहुंची है।

इससे पहले 2012 में हुए चुनाव में दो महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था, जबकि इससे पहले 2008 के चुनाव में पांच महिलाएं चुनाव लड़ी थीं, जीत नहीं पाईं।

साल 1977 में यूडीपी के टिकट पर चुनाव लड़कर लोकसभा पहुंचने वाली रानो शाइजा के बाद राज्य की एक भी महिला लोकसभा तो दूर, विधानसभा की दहलीज भी नहीं लांघ पाई।

महिला आरक्षण को लेकर मुख्यमंत्री टी.आर. जेलियांग को कुर्सी तक गंवानी पड़ी थी। उन्होंने महिलाओं को शहरी निकाय चुनावों में 33 फीसदी आरक्षण देने की कोशिश की थी, लेकिन राज्य में उनके खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हुए और उन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी।

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आईएएनएस

चाईबासा : जगन्नाथपुर जिला परिषद सदस्य भाजपा छोड़ थामा झामुमों का दामन

NewsCode Jharkhand | 17 July, 2018 11:26 AM
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चाईबासा । जैसे जैसे चुनाव नजदीक पहुंच रही है , वैसे वैसे जोड़ तोड़ की राजनीति भी तूल पकड़ने लगी है। जहां कुछ लोग पार्टी की विचार धारा पच नहीं रही है , तो कई पार्टी की वरीय पदाधिकारियों की उपेक्षा। इस राजनीतिक घटना क्रम से साफ पता चलता है कि आने वाली कल की राजनीति में बड़ा उलट फेर होने इंकार नहीं किया जा सकता है।

 पश्चिमी सिंहभूम भाजपा जिला अध्यक्ष शुरु नंदी के कार्यशैली व रैवया से पार्टी के वरीय पदाधिकारी व युवा कार्यकर्ता खुश नहीं है। अब तक कई कार्यकर्ताओं ने पार्टी छोड़ अन्य पार्टी का दामन थाम चुके है ।

चाईबासा : विभागीय लापरवाही में फिर गयी एक ठेका बिजली मिस्त्री की जान

सोमवार को जगन्नाथपुर जिला परिषद सदस्य व भाजपा युवा नेता अभिशेख सिंकु उर्फ मुन्ना के नेतृत्व में दर्जनों भाजपा कार्यकर्ता सहित जभासपा , कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने झामुमो सुप्रीमो शिबु सोरेन के समक्ष उनके आवास में विधिवत रुप से शामिल हो गए।

चाईबासा : जगन्नाथपुर जिला परिषद सदस्य भाजपा छोड़ थामा झामुमों का दामन

जिप सदस्य श्री सिंकु ने बताया कि भाजपा अपनी विचार धारा से भटक गई है।  यह सिर्फ अमित शाह व रघुवर दास की विचार धारा की पार्टी रह गई है । झारखंङ के विकास के नाम पर विनाश करने का काम किया जा रहा है। जो आने वाले समय में भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।

ये हुए भाजपा छोड़ झामुमों में शामिल

अभिशेक सिंकु — जिप सदस्य सह भाजपा नेता

संजय बारिक —  उप प्रमुख सह भाजपा नेता

हरिश हेंब्रम – भाजपा नेता

उमेश गोप – करंजिया पंचायत प्रभारी

बलदेव लागुरी – पोखरपी पंचायत अध्यक्ष

जयपाल लागुरी – पंचायत प्रभारी पोखरपी

 जभासपा मार्शल लागुरी

 सिकंदर तिरिया

रमेश सिंकु

विपिन सिंकु

मुखिया कृष्णा लागुरी

 मुखिया दमयंती लागुरी

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झरिया : धमाका, फायरिंग और मारपीट से क्षेत्र में दहशत, शादी समारोह घर में भी मचा कोहराम

NewsCode Jharkhand | 17 July, 2018 11:29 AM
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झरिया (धनबाद) । भौरा थाना क्षेत्र के भौरा नीचे बाजार व ऊपर बाजार में बीती रात हथियारबंद लोगों ने हमला बोल दिया। दर्जनो राउंड फायरिंग की तथा कई घरों पर देसी व पेट्रोल बम फेंके गए। आधा दर्जन लोग घायल हो गए हैं। इनमें महिलाएं भी शामिल हैं।

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आरोपी न्यू क्वार्टर के रहने वाले हैं वह 70 – 80 के संख्या में थे। आरोपियों ने भौरा पुलिस के वाहन पर भी पथराव किया। पुलिस को भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी। हमलावर करीब आधे घंटे तक उत्पात मचाते रहे। मामले की गंभीरता को देख भौरा पुलिस ने जोड़ापोखर, पाथरडीह, सुदामडीह, सहित कई थानों की पुलिस को घटनास्थल पर बुलवा लिया और कई अधिकारी भी घटनास्थल पर पहुंच गए।

हमलावर भौरा बाजार निवासी बालेश्वर उर्फ वाले यादव के शादी वाले घर में घुस गए और महिलाओं के साथ मारपीट दुर्व्यवहार तथा लूटपाट की। दूल्हे नीरज कुमार यादव की चेन और अंगूठी भी लूट ली और दूल्हे के साथ भी मारपीट की । इस दौरान एक महिला की कान की बाली भी खिंच डाली। इस घर से मंगलवार को बारात जानी है। नीरज यादव स्वर्गीय रंजीत यादव का पुत्र हैं।

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हॉकी, स्टिक, डंडे से पिटाई में बालेश्वर यादव, चंद्रवती देवी,शांति देवी बबली देवी, रीना देवी आदि घायल हो गए। सभी घायलों को भौरा अस्पताल लाया गया गंभीर स्थिति को देख चिकित्सकों ने उन्हें पीएमसीएच रेफर कर दिया है। घटना के पीछे आपसी रंजिश बताई जाती है।

हमलावरों ने दुकानों पर भी हमला कर दिया और तोड़फोड़ किया। जिसको लेकर दुकानदारों में भारी रोष है और आज बाजार के सारे दुकानदार अपने-अपने दुकान बंद कर आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग कर पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगा रहे हैं।

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गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- केंद्र और राज्य सरकारें बनाएं कानून

NewsCode | 17 July, 2018 11:22 AM
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नई दिल्ली। गोरक्षकों द्वारा हिंसा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग की घटनाएं रोकने के लिए दिशानिर्देश जारी किए है। कोर्ट ने चार हफ्ते में केंद्र और राज्यों को लागू करने के आदेश दिए है। कोर्ट ने कहा कि गोरक्षा के नाम पर कोई भी शख्स कानून को हाथ में नहीं ले सकता है।

केंद्र और राज्य सरकार को गाइडलाइन जारी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गोरक्षा के नाम पर होने वाली हिंसा के लिए कानून व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।

अदालत ने कहा कि सरकारें हिंसा की इजाजत नहीं दे सकती हैं। सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पी. एस. नरसिम्हा ने कहा था कि केंद्र सरकार इस मामले में सजग और सतर्क है, लेकिन मुख्य समस्या कानून व्यवस्था की है। कानून व्यवस्था पर नियंत्रण रखना राज्यों की जिम्मेदारी है। केंद्र इसमें तब तक दखल नहीं दे सकता जब तक कि राज्य खुद गुहार ना लगाएं।

बता दें कि गोरक्षा के नाम पर हो रही भीड़ की हिंसा पर रोक लगाने के संबंध में दिशानिर्देश जारी करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ये राज्य सरकारों का दायित्व है कि वह इस तरह से हो रही भीड़ की हिंसा को रोकें।

गोरक्षा के नाम पर हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘मॉबोक्रेसी’ को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, और इसे नया नियम नहीं बनने दिया जा सकता है। कोर्ट के मुताबिक, इससे कड़ाई से निपटना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने गोरक्षा के नाम पर हुई हत्याओं के सिलसिले में प्रिवेंटिव, रेमिडियल और प्यूनिटिव दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि संसद को इसके लिए कानून बनाना चाहिए, जिसमें भीड़ द्वारा हत्या के लिए सज़ा का प्रावधान हो। मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट अगस्त में करेगा।

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याचिकाकर्ता इंदिरा जयसिह ने कहा कि भारत में अपराधियों के लिए गोरक्षा के नाम पर हत्या करना गर्व की बात बन गई है। उन्होंने कहा कि सरकार अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रही है और उन्हें जीवन की सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रही है। उन्होंने कहा कि सरकारें इस तरह के अपराध करने वालों पर सख्त कार्रवाई करने में भी विफल रही हैं। इसलिए वक्त की मांग है कि इस बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएं।

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