भारतीय कृषि उत्पादों के लिए चीन संभावित बड़ा बाजार!

NewsCode | 1 May, 2018 8:03 AM
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नई दिल्ली| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच पिछले सप्ताह अनौपचारिक शिखर वार्ता के बाद भारतीय कृषि उत्पादों के लिए चीन को संभावित बड़े बाजार के रूप में देखा जा रहा है। मगर, बाजार के जानकारों की माने तो भारत से किसी भी कृषि उत्पाद का निर्यात अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमत पर निर्भर करेगा।

भारत सिर्फ उन्हीं उत्पादों का निर्यात कर पाएगा जिनका निर्यात पहले से ही हो रहा है। बाकी उत्पादों का निर्यात तभी संभव होगा जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी देशों के उत्पादों से सस्ते होंगे।

पंजाब बासमती राइस मिलर्स एसोसिएशन के प्रवक्ता आशीष कथुरिया ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि भारत पहले से ही चावल का प्रमुख निर्यातक है और चीन अगर भारत से चावल खरीदेगा तो गैर-बासमती चावल का निर्यात बढ़ सकता है।

उन्होंने कहा, “चीन में पानी की कमी के कारण बहुत सारी फसलों की खेती वहां कम हो गई, जिससे वह चावल समेत कई खाद्यान्नों का आयात करने लगा है। चीन में गैर-बासमती चावल की खपत है और वह अगर हमसे चावल खरीदता है तो हमारा गैर-बासमती चावल का निर्यात 20-25 फीसदी बढ़ सकता है।” 

एपीडा के आंकड़ों के मुताबिक, भारत का गैर-बासमती चावल निर्यात वर्ष 2017-18 में 86,33,237 टन रहा जिसका मूल्य 22,927 करोड़ रुपये था जो कि पिछले साल के मुकाबले 35.42 फीसदी ज्यादा है।

इस साल फरवरी में जारी फसल वर्ष 2017-18 के द्वितीय अग्रिम उत्पादन के मुताबिक, भारत में चावल का उत्पादन 11.10 करोड़ टन हो सकता है। हालांकि कृषि विशेषज्ञ उत्पादन में और बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं।

नकदी फसलों में भारत रूई (कपास) का सबसे बड़ा उत्पादक है और चीन हमेशा से इसका बड़ा बाजार रहा है। मगर विगत वर्षो में चीन का झुकाव अमेरिका की तरफ होने से भारत से उसकी खरीदारी कम हुई है। हालांकि चीन भारत कॉटन यार्न यानी धागों का आयात करता रहा है।

कॉटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रमुख अतुल गंतरा के मुताबिक इस साल चीन भारत से 10-15 लाख गांठ (170 किलोग्राम प्रति गांठ) रूई खरीदेगा जबकि अगले साल भारत कम से कम 30 लाख गांठ रूई चीन को निर्यात करेगा। उन्होंने कहा कि मोदी-जिनपिंग की वार्ता के बाद चीन के साथ भारत का व्यापार सुगम होगा।

उधर, सोयाबीन निर्यात पर सोयाबीन प्रोसेर्स एसोएिशन ऑफ इंडिया के एग्जिक्यूटिव डायरेक्टर डी. एन. पाठक ने कहा, “हमारे पास सोयाबीन की पैदावार उतनी नहीं है कि हम निर्यात करें क्योंकि खाद्य तेल की खपत हमारी जितनी है उतना हमारा उत्पादन नहीं है और हमें अपनी जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता है।मगर, हम सोयामील का निर्यात करते हैं। अगर, चीन को सोयामील का निर्यात होता है तो निस्संदेह इससे किसानों और घरेलू मिलों को फायदा मिलेगा।”

हालांकि उन्होंने कहा, निर्यात तभी संभव है जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में ब्राजील, अर्जेटीना और अमेरिका के मुकाबले भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धी हो।

भारत में इस साल चीनी, गेहूं और मक्के का भी रिकॉर्ड उत्पादन है। मगर, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चीनी का मूल्य भारतीय बाजार के मुकाबले करीब 1,000 रुपये प्रति क्विं टल ज्यादा है। यही कारण है कि भारतीय चीनी उद्योग सरकार से निर्यात प्रोत्साहन की मांग कर रहा है। उधर, गेहूं भी यूक्रेन और रूस में भारत के मुकाबले सस्ता है। मक्का भी भारत के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सस्ता है। ऐसे में इन खाद्यान्नों का निर्यात संभव नहीं है।

कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि जिस देश में लोग भूखे रहते हों उसे खाद्यान्नों के निर्यात के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।

उधर, दलहनों का उत्पादन ज्यादा होने के कारण घरेलू बाजार में दलहनों में छायी सुस्ती से उबरने और किसानों को वाजिब दाम दिलाने के मकसद से सरकार ने दलहन निर्यात से इस साल प्रतिबंध हटा लिया। मगर निर्यात में कोई ज्यादा फर्क नहीं आया क्योंकि भारत दलहनों का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ-साथ उपभोक्ता भी है। अन्य देशों में इसकी खपत कम है।

इंडियन पल्सेस एंड ग्रेन एसोसिएशन के सदस्य प्रदीप जिंदल ने कहा, “हमारे पास जिन दलहनों का उत्पादन ज्यादा है उसके लिए चीन में कोई बाजार नहीं है। हम खुद राजमा चीन से आयात करते हैं।”

प्रधानमंत्री ने पिछले सप्ताह अपने चीन दौरे पर चीनी राष्ट्राध्यक्ष से जिन मुद्दों पर बातचीत की उनमें व्यापार के मसले अहम थे।

गौरतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा चीनी उत्पादों के आयात पर भारी शुल्क लगाने पर जवाबी कार्रवाई करते हुए चीन ने भी कुछ अमेरिकी वस्तुओं पर आयात शुल्क लगाने की घोषणा कर दी।

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दुनिया की दो आर्थिक महाशक्तियों के बीच व्यापारिक हितों के टकराव से व्यापारिक जंग का खतरा पैदा हो गया था। हालांकि दोनों देशों के बीच तनाव में थोड़ी नरमी जरूर आई है लेकिन चीन अपनी जरूरतों की निर्भरता अमेरिका पर कम करने के लिए दुनिया के अन्य देशों के बाजारों का रुख कर रहा है। इसी क्रम में भारत के साथ उसके व्यापारिक रिश्तों में सुधार देखा जा रहा है।

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 आईएएनएस

दिल्ली में 14,000 से ज्यादा पेड़ों की कटाई के विरोध में ‘आप’ का चिपका आंदोलन

NewsCode | 24 June, 2018 7:54 PM
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नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पुनर्विकास के नाम पर 14 हजार से ज्यादा पेड़ काटने का विरोध तेज हो गया है। आम लोगों के साथ अब आम आदमी पार्टी भी इसके खिलाफ उतर आई है। आज रविवार को सरोजिनी नगर में पार्टी ने एक बड़े चिपको आंदोलन का आयोजन किया। सोशल मीडिया में #DelhiChipkoAndolan लगातार ट्रेंड कर रहा है।

दिल्ली सरकार में ‘आप’ के मंत्री इमरान हुसैन ने कई विधायकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर पेड़ों से चिपककर विरोध-प्रदर्शन किया। लोग हाथ से लिखे पोस्टर के साथ पेड़ों को बचाने की अपील करने के लिए वहां पहुंचे थे।

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन ने केंद्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी से इस प्रोजेक्ट को किसी दूसरे जगह शिफ्ट करने की अपील की।

वहीं, पार्टी के विधायक सौरभ भारद्वाज ने कहा कि, “जब सारी जनता , दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार पेड़ों के बारे में इतनी चिंतित है तो केन्द्र सरकार प्रोजेक्ट बंद कर दे। अब कोई पेड़ ना काटा जाए”

बता दें कि सरोजिनी नगर में शनिवार को भी पेड़ काटने के विरोध में कुछ स्थानीय लोगों और युवाओं ने पेड़ से चिपककर उसे बचाने की अपील की।उनका कहना था कि सुंदर नगर में पेड़ कट चुके हैं। अब सरोजिनी नगर व आरकेपुरम में इन्हें काटा जाना है। हम इसका विरोध कर रहे है। सभी ने कहा कि प्रदूषण मुक्त दिल्ली का नारा पेड़ काटने से पूरा नहीं होगा।

क्या है पूरा मामला ?

दरअसल, केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने दक्षिणी दिल्ली में स्थित सात सरकारी आवसीय कॉलोनियों के पुनर्विकास का प्रस्ताव बनाया था। केंद्र सरकार की कैबिनेट इस पुनर्विकास प्लान को वर्ष 2016 में ही मंजूरी दे चुकी है। इसके तहत ही दक्षिणी दिल्ली में स्थित किदवई नगर में 1123, नेताजी नगर में 2294, नैरोजी नगर में 1454, मोहम्मदपुर में 363 और सरोजनी नगर में 11 हजार से अधिक पेड़ काटे जाने हैं। नैरोजी में पेड़ों की कटाई भी शुरू हो चुकी है। अब इन पेड़ों की कटाई का विरोध शुरू हो गया है। हालांकि केंद्र सरकार का कहना है कि वह जितने पेड़ काटेंगे उससे दोगुना पौधे लगाएं जाएंगे। पूरा पुनर्विकास प्लान ग्रीन प्रोजेक्ट होगा।

1973 में पहली बार हुआ था चिपको आंदोलन

चिपको आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली में वर्ष 1973 में हुई थी। तब ग्रामीण किसानों ने राज्य के वन ठेकेदारों द्वारा वनों और जंगलों को काटने के विरोध में चिपको आन्दोलन चलाया था। चिपको आंदोलन का सीधे-सीधे अर्थ है किसी चीज से चिपककर उसकी रक्षा करना। जब यह आंदोलन वहां पर चल रहा था, तब वनों की कटाई को रोकने के लिए गांव के पुरुष और महिलाएं पेड़ों से लिपट जाती थीं और ठेकेदारों को पेड़ नहीं काटने देती थी। इस आंदोलन में महिलाओं की संख्या अधिक होती थी।

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इस आंदोलन को चंडीप्रसाद भट्ट, गौरा देवी और ग्रामीणों ने मिलकर अंजाम दिया था। बाद में प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी सुन्दरलाल बहुगुणा ने आगे बढ़ाया। आंदोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया है। जिस समय यह आन्दोलन चल रहा था, उस समय केंद्र की राजनीति में भी पर्यावरण एक एजेंडा बन गया था। इस आंदोलन को देखते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार ने वन संरक्षण अधिनियम बनाया।

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धनबाद : झरिया के अस्तित्‍व को बचाने के लिए फिर होगा आंदोलन

NewsCode Jharkhand | 24 June, 2018 7:48 PM
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झरिया को उजाडने की सरकारी मंसूबे को जनता कामयाब नहीं होने देगी

धनबाद (झरिया)। झरिया के अस्तित्व को बचाने के लिए एक बार फिर आंदोलन होगा। इसबार आंदोलन की मुख्‍य भूमिका में पूर्व मंत्री समरेश सिंह रहेंगे। आंदोलन की रुपरेखा तैयार करने के बावत आज झरिया प्रेस क्लब में समरेश सिंह की अगुवाई में बैठक हुई जिसमें पूर्व में हो चुके झरिया आंदोलन से जुड़े कई लोगों ने भाग लिया।

बैठक में निर्णय लिया गया कि झरिया को बचाने के लिए यह आखिरी आंदोलन होगा। इस आंदोलन में झरिया की जनता पूरी ईमानदारी से लड़ेगी।

बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि बंद आर एस पी कॉलेज को उसी जगह चालू किया जाएगा जहां वह है। इसके लिए कोर्ट जाना पड़े या कहीं और लेकिन बंद कॉलेज को खुलवाया जाएगा। बैठक में भाग ले रह लोगों ने एकसुर से कहा कि केंद्र व राज्य सरकार झरिया के अस्तित्व को खत्म करना चाहती है जिसे यहां की जनता सफल नहीं होने देगी।

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गिरीडीह : सुरीली आवाज से जिले के साथ गांव का नाम रौशन करना चाहती है नाजिया

NewsCode Jharkhand | 24 June, 2018 7:36 PM
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उदित नारायण के साथ मंच साझा कर चुकी है

गिरीडीह। अपनी सुरीली आवाज से संगीत की दुनिया में धूम मचानेवाली नाजिया परवीन अपने गृह जिले गिरीडीह व गांव का नाम रौशन कर रही है। वह इस जिले के पिहरा गांव की रहनेवाली है। मशहूर बॉलीवुड गायक उदित नारायण के साथ वह मंच साझा कर चुकी है।

हाल ही में उनकी मेरी आवाज ही मेरी पहचान है एलबम रिलीज हुई है। एलबम में वह पर्दे पर गाती नजर आती है। आवाज में तो वाकई जादू है। ईद के मौके पर अपने घर पहुंची नाजिया ने बताया कि झारखंड की नक्सली घटना पर चिलखारी एक दर्द नामक सिनेमा बन रही है जिसमें उन्‍हें उदित नारायण के साथ गाने का मौका मिला।

गिरीडीह : युवती को लेकर युवक फरार, परिजनों ने थाने में लगाई गुहार

नाजिया इससे पहले तू लौट के आजा एलबम में एक गीत को आवाज दे चुकी है। नाजिया के पिता मोहम्‍मद मोइनुद्दीन पेशे से एक किसान हैं व मां जैनब खातून आंगनबाड़ी सेविका है।

 गिरीडीह : सुरीली आवाज से जिले के साथ गांव का नाम रौशन करना चाहती है नाजिया

मैट्रिक तक की पढ़ाई कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय गावां से पूरी करने के बाद नाजिया रांची में रहकर एमए करने के साथ-साथ संगीत भी सीख रही है। कस्‍तूरबा विद्यालय में पढ़ने के दौरान नाजिया स्‍कूल में आयोजित गीत-संगीत व नृत्‍य प्रतियोगिता में भाग लेती थी और दर्शकों का वाहवाही बटोरती थी।

नाजिया का सपना अपनी आवाज के जरिये पिछडे जिले में शुमार गिरीडीह तथा अपने गांव पिहरा गावां को पहचान दिलाना है।

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