आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

NewsCode | 25 December, 2017 12:40 AM

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी बाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरुष के रूप में दर्ज है। उनकी पहचान एक कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की विचारधारा में पले-बढ़े अटल जी राजनीति में उदारवाद और समता एवं समानता के समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने विचारधारा की कीलों से कभी अपने को नहीं बांधा।

उन्होंने राजनीति को दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया। जीवन में आने वाली हर विषम परिस्थितियों और चुनौतियों को स्वीकार किया। नीतिगत सिद्धांत और वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन के उतार चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित रखा। राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधारा और कार्यशैली के कायल रहे। पोखरण जैसा आणविक परीक्षण कर दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ दूसरे मुल्कों को भारत की शक्ति का अहसास कराया।

जनसंघ के संस्थापकों में से एक अटल बिहारी बाजपेयी के राजनीतिक मूल्यों की पहचान बाद में हुई और उन्हें भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

अटल बिहारी बाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसम्बर 1924 को हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी बाजपेयी शिक्षक थे। उनकी माता कृष्णा जी थीं। वैसे मूलत: उनका संबंध उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्वर गांव से है लेकिन, पिता जी मध्य प्रदेश में शिक्षक थे। इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ। लेकिन, उत्तर प्रदेश से उनका राजनीतिक लगाव सबसे अधिक रहा। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से वे सांसद रहे थे।

कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था कि मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ खूब चर्चित रहा जिसमें..हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा..खास चर्चा में रही।

राजनीति में संख्या बल का आंकड़ा सर्वोपरि होने से 1996 में उनकी सरकार सिर्फ एक मत से गिर गई और उन्हें प्रधानमंत्री का पद त्यागना पड़ा। यह सरकार सिर्फ तेरह दिन तक रही। बाद में उन्होंने प्रतिपक्ष की भूमिका निभायी। इसके बाद हुए चुनाव में वे दोबारा प्रधानमंत्री बने।

राजनीतिक सेवा का व्रत लेने के कारण वे आजीवन कुंवारे रहे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के लिए आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया था।

अटल बिहारी बाजपेयी ने अपनी राजनीतिक कुशलता से भाजपा को देश में शीर्ष राजनीतिक सम्मान दिलाया। दो दर्जन से अधिक राजनीतिक दलों को मिलाकर उन्होंने राजग बनाया जिसकी सरकार में 80 से अधिक मंत्री थे, जिसे जम्बो मंत्रीमंडल भी कहा गया। इस सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

अटल बिहारी बाजपेयी राजनीति में कभी भी आक्रमकता के पोषक नहीं थे। वैचारिकता को उन्होंने हमेशा तवज्जो दिया। अटलजी मानते हैं कि राजनीति उनके मन का पहला विषय नहीं था। राजनीति से उन्हें कभी-कभी तृष्णा होती थी। लेकिन, वे चाहकर भी इससे पलायित नहीं हो सकते थे क्योंकि विपक्ष उन पर पलायन की मोहर लगा देता। वे अपने राजनैतिक दायित्वों का डट कर मुकाबला करना चाहते थे। यह उनके जीवन संघर्ष की भी खूबी रही।

वे एक कवि के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे। लेकिन, शुरुआत पत्रकारिता से हुई। पत्रकारिता ही उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी। उन्होंने संघ के मुखपत्र पांचजन्य, राष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन किया। 1957 में देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे जिसमें एक अटल बिहारी बाजपेयी थी थे। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी में भाषण देने वाले अटलजी पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे। हिन्दी को सम्मानित करने का काम विदेश की धरती पर अटलजी ने किया।

उन्होंने सबसे पहले 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में 1957 में गोंडा की बलरामपुर सीट से जनसंघ उम्मीदवार के रूप में जीत कर लोकसभा पहुंचे। उन्हें मथुरा और लखनऊ से भी लड़ाया गया लेकिन हार गए। अटल जी ने बीस सालों तक जनसंघ के संसदीय दल के नेता के रूप में काम किया।

इंदिरा जी के खिलाफ जब विपक्ष एक हुआ और बाद में जब देश में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो अटल जी को विदेशमंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता की छाप छोड़ी और विदेश नीति को बुलंदियों पर पहुंचाया। बाद में 1980 में जनता पार्टी से नाराज होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया। इसके बाद बनी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापकों में वह एक थे। उसी साल उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान सौंपी गयी। इसके बाद 1986 तक उन्होंने भाजपा अध्यक्ष पद संभाला। उन्होंने इंदिरा गांधी के कुछ कार्यों की तब सराहना की थी, जब संघ उनकी विचारधारा का विरोध कर रहा था।

कहा जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को दुर्गा की उपाधि उन्हीं की तरफ से दी गई। उन्होंने इंदिरा सरकार की तरफ से 1975 में लादे गए आपातकाल का विरोध किया। लेकिन, बंग्लादेश के निर्माण में इंदिरा गांधी की भूमिका को उन्होंने सराहा था।

अटल हमेशा से समाज में समानता के पोषक रहे। विदेश नीति पर उनका नजरिया साफ था। वह आर्थिक उदारीकरण एवं विदेशी मदद के विरोधी नहीं रहे हैं लेकिन वह इमदाद देशहित के खिलाफ हो, ऐसी नीति को बढ़ावा देने के वह हिमायती नहीं रहे। उन्हें विदेश नीति पर देश की अस्मिता से कोई समझौता स्वीकार नहीं था।

अटल जी ने लालबहादुर शास्त्री जी की तरफ से दिए गए नारे जय जवान जय किसान में अलग से जय विज्ञान भी जोड़ा। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता गवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बाद भी राजस्थान के पोखरण में 1998 में परमाणु परीक्षण किया। इस परीक्षण के बाद अमेरिका समेत कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन उनकी दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति ने इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रूप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का भी डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को धूल चटायी।

उन्होंने दक्षिण भारत के सालों पुराने कावेरी जल विवाद का हल निकालने का प्रयास किया। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना से देश को राजमार्ग से जोड़ने के लिए कारिडोर बनाया। मुख्य मार्ग से गांवों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना बेहतर विकास का विकल्प लेकर सामने आई। कोंकण रेल सेवा की आधारशिला उन्हीं के काल में रखी गई थी।

(प्रभुनाथ शुक्ल स्वतंत्र पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं)

UP: बीजेपी विधायक की दादागिरी, सरकारी कर्मचारी को ‘मुर्गा’ बनाया, फिर बेहोश होने तक कराई उठक-बैठक

NewsCode | 21 April, 2018 10:07 AM

UP: बीजेपी विधायक की दादागिरी, सरकारी कर्मचारी को ‘मुर्गा’ बनाया, फिर बेहोश होने तक कराई उठक-बैठक

बांदा। उत्तर प्रदेश में भाजपा विधायकों और नेताओं की दबंगई के नमूने लगातार सामने आ रहे हैं। बांदा के सदर विधायक प्रकाश द्विवेदी ने पेयजल संकट के बहाने जल संस्थान के टैंकर प्रभारी को सरेआम पहले ‘मुर्गा’ बनाया, फिर तब तक उठक-बैठक करवाई, जब तक वह बेहोश होकर जमीन पर गिर न गया।

गुरुवार को हुआ यह था कि बांदा शहर में पेयजल संकट को लेकर भारतीय जनता पार्टी के नेता व सदर विधायक प्रकाश द्विवेदी जल संस्थान के अभियंताओं के साथ कई मुहल्लों का दौरा किया, जहां लोगों ने टैंकरों से पानी उपलब्ध कराने में गड़बड़ी की शिकायत की। लोगों की शिकायत से ‘माननीय’ का पारा चढ़ गया और जल संस्थान के टैंकर प्रभारी/लिपिक को अधिकारियों और आम जनता के सामने पहले मुर्गा बनाया, फिर बेहोश होने तक उठक-बैठक करवाई।

पीड़ित लिपिक नरेंद्र कुमार ने शुक्रवार को बताया, “अधिकारी समय से टैंकर में पानी नहीं उपलब्ध करवाते, जिससे पानी वितरण में बाधा आती है। लेकिन, गुरुवार को विधायक जी ने पहले सरेआम मुझे मुर्गा बनाकर झुकाए रहे, बाद में तब तक कड़ी धूप में उठा-बैठक लगवाई, जब तक मैं बेहोशर होकर जमीन पर नहीं गिर गया।”

उसने कहा, “मेरे साथ बुरा बर्ताव किया गया है, जिससे मैं बेहद आहत हूं।”

भाजपा विधायक प्रकाश द्विवेदी ने शुक्रवार को एक बार फिर दोहराया, “अभी मुर्गा बनाया है और उठा-बैठक करवाई है। शहर का पेयजल संकट दूर न किया गया तो जनता अधिकारियों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटेगी, मैं जनता के साथ हूं।”

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आईएएनएस

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सामान्य मॉनसून की आहट से शेयर बाजार गुलजार

NewsCode | 21 April, 2018 9:40 AM

सामान्य मॉनसून की आहट से शेयर बाजार गुलजार

मुंबई। बीते सप्ताह शेयर बाजारों में तेजी का रुख रहा, जिसमें भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) द्वारा इस साल सामान्य मॉनसून के अनुमान लगाने का प्रमुख योगदान रहा। साथ ही मार्च में खाद्य कीमतों में नरमी के कारण थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) आधारित मुद्रास्फीति में भी गिरावट दर्ज की गई और यह 2.47 फीसदी रही। इससे भी निवेशकों के हौसले बुलंद हुए। साथ ही सकारात्मक वैश्विक संकेतों का भी निवेशकों के मनोबल को बढ़ाने में प्रमुख योगदान रहा। बीते सप्ताह साप्ताहिक आधार पर सेंसेक्स 222.93 अंकों या 0.65 फीसदी की तेजी के साथ 34,415.58 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 83.45 अंकों या 0.80 फीसदी की तेजी के साथ 10,564.05 पर बंद हुआ। बीएसई का मिडकैप सूचकांक 121.18 अंकों या 0.73 फीसदी की तेजी के साथ 16,798.94 पर तथा स्मॉलकैप सूचकांक 196.04 अंकों या 1.09 फीसदी की तेजी के साथ 18,178.03 पर बंद हुआ।

सोमवार को शेयर बाजारों की सकारात्मक शुरुआत हुई। सेंसेक्स 112.78 अंकों या 0.33 फीसदी की तेजी के साथ 34,305.43 पर तथा निफ्टी 47.75 अंकों या 0.46 फीसदी की तेजी के साथ 10,528.35 पर बंद हुआ। मंगलवार को सेंसेक्स 89.63 अंकों या 0.26 फीसदी की तेजी के साथ 34,395.06 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 20.35 अंकों या 0.19 फीसदी की तेजी के साथ 10,548.70 पर बंद हुआ।

बुधवार को शेयर बाजारों में पिछले 9 लगातार सत्रों की बढ़ोतरी के बाद सुधार देखा गया और सेंसेक्स 63.38 अंकों या 0.18 फीसदी की गिरावट के साथ 34,331.68 पर बंद हुआ तथा निफ्टी 22.50 अंकों या 0.21 फीसदी की गिरावट के साथ 10,526.20 पर बंद हुआ।

गुरुवार को एक बार फिर बाजार में तेजी आई और सेंसेक्स 95.61 अंकों या 0.28 फीसदी की तेजी के साथ 34,427.29 पर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 39.10 अंकों या 0.37 फीसदी की तेजी के साथ 10,565.30 पर बंद हुआ। शुक्रवार को सेंसेक्स 11.71 अंकों या 0.03 फीसदी की गिरावट के साथ 34,415.58 पर तथा निफ्टी 1.25 अंकों या 0.01 फीसदी की गिरावट के साथ 10,564.05 पर बंद हुआ।

बीते सप्ताह सेंसेक्स के तेजी वाले शेयरों में प्रमुख रहे – टीसीएस (8.11 फीसदी), इंफोसिस (0.79 फीसदी), विप्रो (1.70 फीसदी), हिन्दुस्तान यूनीलीवर (3.96 फीसदी), रिलायंस इंडस्ट्रीज (1.15 फीसदी) और महिद्रा एंड महिंद्रा (1.57 फीसदी)।

सेंसेक्स के गिरावट वाले शेयरों में प्रमुख रहे – एक्सिस बैंक (6.53 फीसदी), स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (3.90 फीसदी), आईसीआईसीआई बैंक (2.17 फीसदी), इंडसइंड बैंक (2.01 फीसदी), मारुति सुजुकी (1.11 फीसदी), टाटा मोटर्स (5.72 फीसदी), एचडीएफसी (0.49 फीसदी) और अडानी पोर्ट्स (0.51 फीसदी)।

व्यापक आर्थिक मोर्चे पर, भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने अनुमान लगाया है देश में इस साल मॉनसून सामान्य रहेगा और औसत बारिश 97 फीसदी होने की संभावना है।

भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने सोमवार को यह घोषणा की है। इस मौसम अनुमान में बताया गया है कि इसमें दीर्घकालिक औसत (एलपीए) से पांच फीसदी कम-ज्यादा तक की गलती हो सकती है।

इन आंकड़ों में 96 से 104 फीसदी तक को सामान्य मॉनसून माना जाता है।

इससे पहले, चार अप्रैल को निजी मौसम अनुमान एजेंसी स्काईमेट ने भी सामान्य मॉनसून का अनुमान लगाया था और 100 फीसदी बारिश होने की संभावना जताई थी, जबकि इसमें पांच फीसदी की गलती की गुंजाइश बताई गई थी।

आईएमडी ने हालांकि कहा कि बारिश को लेकर स्पष्ट तस्वीर जून में ही सामने आएगी। बारिश का मौसम एक जून से 30 सितंबर तक होता है।

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आईएएनएस

जरूरत से बहुत कम कैल्शियम खाते हैं भारतीय, एक दिन में कम-से-कम इतना खाना चाहिए

कम मात्रा में कैल्शियम की खुराक लेने से अस्थि कमजोर हो जाती है और ऑस्टियोपोरोसिस नामक बीमारी का खतरा बना रहता है।

NewsCode | 21 April, 2018 9:23 AM

जरूरत से बहुत कम कैल्शियम खाते हैं भारतीय, एक दिन में कम-से-कम इतना खाना चाहिए

भारत में आमतौर पर लोग कैल्शियम की उतनी खुराक नहीं लेते हैं जितनी शरीर की हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी है। कैल्शियम की खुराक को लेकर जारी एक वैश्विक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वयस्कों की खुराक में कैल्शियम तकरीबन जरूरत की आधी मात्रा होती है।

कैल्शियम अस्थि का प्रमुख अवयव है और स्वस्थ शरीर में इसकी मात्रा 30-35 फीसदी होती है जो हड्डी को मजबूती प्रदान करता है। कम मात्रा में कैल्शियम की खुराक लेने से अस्थि कमजोर हो जाती है और ऑस्टियोपोरोसिस नामक बीमारी का खतरा बना रहता है।

इंटरनेशनल ऑस्टियोपोरोसिस फाउंडेशन (आईओएफ) नामक गैर-सरकारी संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में लोग औसतन महज 429 मिलीग्राम कैल्शिय रोजाना अपने भोजन में लेते हैं जबकि शरीर को इसकी जरूरत 800-1000 मिलीग्राम रोजाना होती है।

रिपोर्ट में 74 देशों को शामिल किया गया है जिसमें सबसे कम कैल्शियम की खुराक 175 मिलीग्राम प्रतिदिन नेपाल के लोग लेते हैं जबकि आइसलैंड के लोग रोजाना अपने भोजन में 1233 मिलीग्राम कैल्शियम की खुराक लेते हैं।

कम मात्रा में कैल्शियम खाने वाले लोग एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में बताए गए हैं, जहां औसतन खुराक 400 से 700 मिलीग्राम प्रतिदिन है।

इस शोध के सह लेखक और भारत से आईओएफ बोर्ड के सदस्य अंबरीश मित्तल ने कहा, “एशिया के कई हिस्सों, खासतौर से दक्षिण पूर्व एशिया में लोग 400-500 मिलीग्राम से भी कम कैल्शियम रोजाना अपनी खुराक में लेते हैं।”

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सिर्फ स्वाद ही नहीं अच्‍छी सेहत के लिए भी रोज खाइए चटनी

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आईएएनएस

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